
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ रामानुजगंज क्षेत्र के त्रिकुंडा जलाशय में एक व्यक्ति के डूबने की घटना ने जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि करीब 60 वर्षीय व्यक्ति जलाशय के गेट को खोलने के लिए अंदर गया था, लेकिन सुबह से अब तक वह बाहर नहीं निकल सका है। घटना के बाद पुलिस और गोताखोरों की टीम जलाशय में उसकी तलाश में जुटी है, लेकिन अभी तक शव बरामद नहीं हो सका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जलाशय में गेट संचालन के लिए चौकीदार और ऑपरेटर नियुक्त हैं, तो एक बाहरी व्यक्ति आखिर गेट तक पहुंचा कैसे? बारिश के मौसम में जलाशय पूरी तरह भरा हुआ है और नदी-नाले उफान पर हैं। ऐसे संवेदनशील समय में जलाशय के गेट खोलने जलाशय में कैसे उतरा ? और सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी थी, स्थानीय इस सवाल का जवाब अब विभाग से जवाब मांग रहा है।

बताया जा रहा है कि जलाशय की निगरानी चौकीदार और ऑपरेटर के अलावा संबंधित एसडीओ और सब इंजीनियर की जिम्मेदारी भी होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति गेट खोलने के लिए अंदर तक पहुंच गया, तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया? क्या मौके पर सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी? क्या ऑपरेटर और चौकीदार अपनी ड्यूटी पर मौजूद थे? और यदि मौजूद थे तो उनकी निगरानी में यह व्यक्ति संवेदनशील हिस्से तक कैसे पहुंच गया?
मामले में जब जल संसाधन विभाग के ईई से बात की गई तो उन्होंने कथित तौर पर यह कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश की कि व्यक्ति शायद शराब के नशे में रहा होगा। लेकिन सवाल यह है कि व्यक्ति नशे में था या नहीं, यह बाद की बात है—वह प्रतिबंधित और खतरनाक क्षेत्र तक पहुंचा कैसे? यदि जलाशय के गेट को खोलने की अनुमति केवल अधिकृत कर्मचारियों को है, तो किसी अनधिकृत व्यक्ति को वहां जाने से रोकना विभाग की पहली जिम्मेदारी थी?
इस घटना ने जिले में जल संसाधन विभाग से जुड़ी पिछली घटनाओं की याद भी ताजा कर दी है। इससे पहले चानन जलाशय में काम के दौरान मशीन के नीचे दबने से ऑपरेटर की मौत हो चुकी है, जिसमें विभागीय सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे थे। वहीं लुत्ती बांध टूटने की घटना में पांच लोगों की जान चली गई थी और एक व्यक्ति का अब तक पता नहीं चल सका है। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग हादसों के बाद केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रह गया है?

त्रिकुंड जलाशय की घटना में भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? चौकीदार, ऑपरेटर, सब इंजीनियर, एसडीओ या फिर पूरे सिस्टम की निगरानी करने वाला विभागीय नेतृत्व?
बारिश के इस संवेदनशील मौसम में जलाशयों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विभाग को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को जलाशय के गेट तक पहुंचने से रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी, तो यह महज एक हादसा नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक और विभागीय लापरवाही का मामला माना जा सकता है।
फिलहाल पुलिस और गोताखोरों की टीम लापता व्यक्ति की तलाश में जुटी है। लेकिन तलाश के साथ-साथ अब यह भी जांच का विषय है कि आखिर वह व्यक्ति जलाशय के गेट तक पहुंचा कैसे और उसे रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी-कर्मचारी उस वक्त कहां थे।
हादसे का सच शव मिलने के बाद सामने आएगा, लेकिन विभाग की जवाबदेही का सवाल अभी से खड़ा हो चुका है।



