डेक्स -भटगांव @ SECL भटगांव कॉलोनी के बीच लंदन थीम पर मीना बाजार लगाया गया है, लेकिन यहां सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पूरा मेला बांस, प्लास्टिक और तिरपाल के सहारे तैयार किया गया है। न झूलों की फिटनेस का प्रमाण पत्र नजर आ रहा है, न झूला संचालित करने वाले ऑपरेटरों के प्रशिक्षित होने की जानकारी है और न ही श्रमिकों के श्रम विभाग में पंजीकृत होने की पुष्टि हो रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मेले के आयोजकों ने सुरक्षा से जुड़े सभी जरूरी मानकों का पालन किया है? क्या अग्निशमन विभाग से फायर एनओसी ली गई है? अगर नहीं, तो आखिर किस आधार पर मेले को अनुमति दी गई?
कॉलोनी के बीच, दुर्गा पंडाल के पास, जहां धार्मिक माहौल है और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना चल रही है, वहां कथित तौर पर भोजपुरी के आपत्तिजनक गाने बजाए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि धार्मिक स्थल के आसपास इस तरह के गानों के प्रसारण पर जिम्मेदारों की नजर क्यों नहीं है? हिंदू संगठन इस मामले में क्या भूमिका निभा रहे हैं?

एक लाख रुपये में मैनेज करने का दावा, आखिर किसे और किसलिए?
मीना बाजार संचालक द्वारा कथित तौर पर प्रचार किया जा रहा है कि एक कथित पत्रकार को मैनेज करने के लिए एक लाख रुपये दिए गए हैं। यदि यह दावा किया जा रहा है, तो इसकी सत्यता की जांच होनी चाहिए। क्या अब कुछ लोग पत्रकारिता को भी ठेके पर लेने और दूसरे पत्रकारों को मैनेज करने का दावा कर रहे हैं?
हालांकि, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कथित तौर पर पत्रकारों को मैनेज करने का जिम्मा किसने लिया है। बड़ा सवाल यह भी है कि सुरक्षा मानकों की जांच करने वाले संबंधित विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों को मैनेज करने का ठेका आखिर किसके पास है? क्या इन दावों में कोई सच्चाई है या यह केवल दबाव बनाने और भ्रम फैलाने का तरीका है? इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
SECL की जमीन पर अनुमति किसने दी?
जब कॉलोनी SECL की है, तो सबसे बड़ा सवाल SECL प्रबंधन से भी है। आखिर किसकी अनुमति से उसकी जमीन पर यह मेला लगाया गया? क्या जमीन आवंटित करने या आयोजन की अनुमति देने से पहले सुरक्षा संबंधी सभी दस्तावेजों की जांच की गई थी? SECL के स्थानीय नेताओं की इस मामले में क्या भूमिका है? अन्य मामलों में सक्रिय नजर आने वाले नेता इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं?
यदि नगर पंचायत भटगांव ने मेले की अनुमति दी है, तो क्या उसने झूलों की फिटनेस, अग्निशमन व्यवस्था, विद्युत सुरक्षा और अन्य जरूरी प्रमाणपत्रों की जांच करने के बाद ही अनुमति जारी की है? क्या अनुमति देने से पहले स्थल का निरीक्षण किया गया था?
गौरतलब है कि पिछले वर्ष झूला झूलने के दौरान झूला टूटने की घटना सामने आई थी। उस घटना के बाद नगर पंचायत की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठे थे। ऐसे में इस बार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पहले से अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत थी।
हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
जब पूरा मेला बांस, प्लास्टिक और तिरपाल के सहारे खड़ा है, तब आग लगने या किसी अन्य दुर्घटना की स्थिति में सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं? क्या आयोजकों ने आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण और भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था की है?
अगर कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कथित तौर पर एक लाख रुपये देकर मामले को मैनेज करने का दावा करने वाले लोग, संबंधित नेता, मेला संचालक, SECL प्रबंधन या अनुमति देने वाली नगर पंचायत?
सवाल सीधा है—क्या किसी संभावित हादसे के बाद जिम्मेदारी तय होगी, या उससे पहले ही सुरक्षा मानकों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी?
धार्मिक आस्था, सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े इन सवालों पर संबंधित विभागों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर जनता की सुरक्षा से बढ़कर किसी मेले का मनोरंजन और किसी का कथित प्रभाव कैसे हो सकता है?