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“जब नहर बनने से पहले ही टूट जाए, तो सवाल बारिश पर नहीं, निर्माण कराने वालों पर उठते हैं।”
“नहर टूटी या भ्रष्टाचार की पोल खुली? पहली ही बारिश में बह गए साढ़े चार करोड़ के दावे”
“बारिश बनी जांच अधिकारी! पहली ही बरसात में खुल गई साढ़े चार करोड़ की नहर की पोल”
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन पहली ही मूसलाधार बारिश ने विकास के दावों की असलियत उजागर कर दी। जल संसाधन विभाग की बहुचर्चित भाला-गिरवानी नहर परियोजना के तहत लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जा रही कंक्रीट नहर पहली ही बारिश में टूट गई। निर्माण कार्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि नहर ने जवाब दे दिया और इसके साथ ही निर्माण गुणवत्ता, विभागीय निगरानी और कथित भ्रष्टाचार पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि यह कोई प्राकृतिक क्षति नहीं, बल्कि निर्माण कार्य में बरती गई भारी लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार का परिणाम है। जिस नहर से क्षेत्र के किसानों को वर्षों तक सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वह पहली ही बारिश का दबाव नहीं झेल सकी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण इतना कमजोर कैसे हो गया?

शुरुआत से उठ रहे थे सवाल, लेकिन जिम्मेदार रहे मौन
स्थानीय किसान सरवन सोनी, इफ्तेखार खान, विनीत गुप्ता और रामकुमार धुर्वे सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण कार्य शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद गुणवत्ता को लेकर संदेह पैदा हो गया था। कई बार विभागीय अधिकारियों को शिकायतें दी गईं, लेकिन हर बार शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया। ग्रामीणों के मुताबिक यदि समय रहते जांच होती तो आज करोड़ों की परियोजना की यह दुर्दशा नहीं होती।
घटिया सामग्री और लापरवाही की चर्चा
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण में मानक स्तर की सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। कंक्रीट की मजबूती के लिए जरूरी देखरेख और क्योरिंग प्रक्रिया भी सही तरीके से नहीं कराई गई। यही वजह है कि नहर का ढांचा पहली ही बारिश में कमजोर साबित हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि अगर निर्माण कार्य गुणवत्ता मानकों के अनुसार किया गया होता तो यह स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होती।
मौके से गायब रहे जिम्मेदार अधिकारी?
ग्रामीणों ने विभागीय इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि निर्माण स्थल पर जिम्मेदार अधिकारी नियमित निरीक्षण के लिए नहीं पहुंचते थे। वहीं ठेकेदार के तकनीकी कर्मचारी भी अधिकांश समय अनुपस्थित रहते थे। ऐसे में करोड़ों रुपये के कार्य की गुणवत्ता की निगरानी आखिर किसके भरोसे हो रही थी, यह बड़ा सवाल बन गया है।
किसानों की उम्मीदों पर फिरा पानी
भाला, परेवा और विजयनगर क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को इस परियोजना से बड़ी उम्मीदें थीं। नहर के जरिए सिंचाई सुविधा मिलने से खेती की लागत कम होने और उत्पादन बढ़ने की संभावना थी। लेकिन निर्माणाधीन नहर के टूटने से किसानों की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अभी भी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया तो पूरी परियोजना भविष्य में बेकार साबित हो सकती है।
अब जांच नहीं, कार्रवाई चाहिए
ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच हो तथा दोषी अधिकारियों और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। ग्रामीणों का कहना है कि किसानों के भविष्य और सरकारी धन से जुड़े इस मामले में केवल जांच का आश्वासन नहीं, बल्कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी दिखाई देनी चाहिए।
पहली बारिश में टूटने वाली यह नहर अब सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के उपयोग और विभागीय जवाबदेही पर खड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।
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