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संजय गुप्ता/सरगुजा (लुण्ड्रा)@ तहसील में भूमाफियाओं के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि अब वे न सिर्फ शासकीय भूमि बल्कि महिलाओं की वैध निजी जमीन पर भी सुनियोजित साजिश के तहत कब्जा जमाने से नहीं चूक रहे.. ऐसा ही एक गंभीर मामला लुण्ड्रा तहसील अंतर्गत ग्राम डांढगांव से सामने आया है, जहां संयुक्त खातेदार महिला की भूमि को कपटपूर्ण तरीके से बंटवारा कराकर हड़प लिया गया ?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, स्वर्गीय संपत एवं जिरा बाई की संयुक्त स्वामित्व व आधिपत्य की भूमि खसरा नंबर 14, कुल रकबा 2.766 हेक्टेयर, को कांति बाई के चाचा ससुर जगन्नाथ एवं बालम द्वारा नायब तहसीलदार लुण्ड्रा के समक्ष फर्जी त्रुटि सुधार आवेदन प्रस्तुत कर अपने नाम दर्ज करवा लिया गया.. आरोप है कि इस पूरे खेल में राजस्व अमले और भू दलालों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है..
इतना ही नहीं, कांति बाई की अनुपस्थिति और महिला होने का नाजायज फायदा उठाते हुए, जिरा बाई के अन्य प्रकरण में अंबिकापुर जेल में निरुद्ध होने की स्थिति का भी लाभ लिया गया.. इसके बाद कपटपूर्ण तरीके से बंटवारा कर खसरा नंबर 107/11, 109, 114, 115, 125, 126, 127 एवं 933 सहित कुल 8 प्लॉट (कुल रकबा 1.844 हेक्टेयर) अपने नाम कराकर भूमि को आनन-फानन में बेच दिया गया.. दिनांक 12/11/2021 को उक्त जमीन को जितेंद्र जैसवानी के साथ मिलकर विक्रय कर दिया गया..

जब इस अवैध बंटवारे की जानकारी जिरा बाई और कांति बाई को हुई, तब उन्होंने तत्काल अनुविभागीय अधिकारी लुण्ड्रा (धौरपुर) के समक्ष राजस्व अपील प्रस्तुत की.. जांच के बाद एसडीओ ने अपील स्वीकार करते हुए कपटपूर्ण बंटवारे को निरस्त कर दिया.. इसके पश्चात पूर्ववत रिकॉर्ड दुरुस्त किए जाने हेतु नायब तहसीलदार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया, जो आज भी सुनवाई के लिए लंबित है..
इधर, मामले को दबाने और दबाव बनाने की नीयत से आरोप है कि कथित भूमाफिया तत्वों द्वारा गुंडा प्रवृत्ति के लोगों के साथ मिलकर कांति व जिरा बाई की खेत में खड़ी धान की फसल जबरन काट ली गई.. इस संबंध में एसडीओ लुण्ड्रा के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई, जहां पटवारी से जांच प्रतिवेदन मांगा गया..
आरोप है कि पटवारी द्वारा नितिन अग्रवाल अंबिकापुर के साथ मिलकर जितेंद जसवानी के पक्ष में (निवासी माही सुपर मार्केट, बसंत लाल गली, अंबिकापुर) के पक्ष में भ्रामक व तथ्यहीन जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसे कांति बाई और जिरा बाई ने सिरे से खारिज किया है.. उनका कहना है कि उनकी आपत्ति को जानबूझकर नहीं सुना गया और पटवारी, दलाल व भूमाफिया मिलकर जमीन हड़पने का षड्यंत्र रच रहे हैं.. पीड़ितों का स्पष्ट कहना है कि उक्त भूमि पर वे स्वर्गीय संपत के समय से निरंतर काबिज हैं और खेती करते आ रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है..
अब बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासनिक आदेश से कपटपूर्ण बंटवारा निरस्त हो चुका है, तो फिर किसके संरक्षण में भूमाफिया सक्रिय हैं ?
क्या दोषी राजस्व अधिकारियों और दलालों पर कोई कार्रवाई होगी या फिर महिला किसान को न्याय के लिए और लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी ?
