
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ जिले में एक के बाद एक अवैध क्लिनिकों पर प्रशासन की कार्रवाई के बाद झोलाछाप डॉक्टरों में हड़कंप मचा हुआ है। राजपुर के बाद अब बलरामपुर ब्लॉक में भी प्रशासनिक टीम ने अवैध रूप से संचालित क्लिनिकों पर दबिश देकर कार्रवाई की है। जवाहरनगर में संचालित अपसेस्प ईएचपी क्लिनिक और दामोदरनगर (तातापानी) में सरकारी स्कूल के शिक्षक प्रदीप कुमार दास द्वारा कथित रूप से संचालित क्लिनिक को प्रशासन ने सील कर दिया है।
कार्रवाई के दौरान अवैध क्लिनिकों से एक्सपायरी डेट की दवाएं मिलने की बात भी सामने आई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य के नाम पर किस तरह लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा था।
दरअसल, हाल ही में जमुआटांड गांव में कथित झोलाछाप डॉक्टर के इलाज के बाद तीन वर्षीय मासूम की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया और कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी की सख्ती के बाद स्वास्थ्य विभाग, राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीमें जिले में अवैध रूप से संचालित क्लिनिकों की जांच और कार्रवाई में जुट गई हैं।

लेकिन अब कार्रवाई से ज्यादा बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। जब गांव-गांव में लंबे समय से झोलाछाप डॉक्टर कथित तौर पर क्लिनिक चला रहे थे, तो विभाग को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं थी? क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही स्वास्थ्य अमले को इन अवैध क्लिनिकों की मौजूदगी दिखाई देती है?
सबसे गंभीर मामला तो तब सामने आया, जब दामोदरनगर में पेशे से सरकारी शिक्षक द्वारा कथित रूप से अवैध क्लिनिक संचालित किए जाने की बात सामने आई। यदि एक सरकारी कर्मचारी ही नियम-कायदों को ताक पर रखकर चिकित्सा संबंधी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो यह महज एक क्लिनिक का मामला नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। अब यह पड़ताल भी जरूरी है कि क्या जिले में ऐसे और सरकारी कर्मचारी हैं, जो अपनी सरकारी जिम्मेदारियों के साथ किसी अन्य अवैध कारोबार में लिप्त हैं?
स्वास्थ्य विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यदि विभाग के पास मैदानी अमला और निगरानी तंत्र मौजूद है, तो फिर अवैध क्लिनिकों की पहचान के लिए किसी हादसे का इंतजार क्यों किया गया? जरूरत है दोषीय पर कड़ी कार्यवाही की।
अब प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि यह अभियान कुछ दिनों की खानापूर्ति बनकर रह जाता है या जिले के गांव-गांव तक पहुंचकर अवैध क्लिनिकों के पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करता है।
क्योंकि सवाल सिर्फ झोलाछाप डॉक्टरों का नहीं है—सवाल उन अधिकारियों की जवाबदेही का भी है, जिनकी नाक के नीचे ये कथित अवैध क्लिनिक लंबे समय से संचालित होते रहे।
अचूक प्रहार की पड़ताल जारी है।




