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संजय गुप्ता/बलरामपुर’चांदो’@ इंसान और जानवर के बीच दोस्ती की कहानियां तो आपने कई सुनी होंगी, लेकिन चांदो थाना की यह कहानी वाकई दिल छू लेने वाली है.. यहां एक बकरा पिछले 13 वर्षों से थाने को ही अपना घर मान चुका है—नाम है कालू.. हैरानी की बात यह है कि कालू किसी आम पालतू जानवर की तरह नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार सिपाही की तरह अपनी “ड्यूटी” निभाता है..
सुबह-शाम गणना का समय हो या परेड—कालू तय वक्त पर जवानों की कतार में खड़ा मिल जाएगा..

जंगलों की गश्त हो या सप्ताह में लगने वाला साप्ताहिक बाजार, कालू खुद थाने से निकलता है, इलाके का भ्रमण करता है और समय पर लौट आता है.. शाम ढलते ही मोर्चे पर खड़ा होकर “मोर्चा संभालना” भी जैसे उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है..
कालू की कहानी भी कम रोचक नहीं.. बताया जाता है कि करीब 12–13 साल पहले उसे एक पार्टी के लिए थाने लाया गया था.. तत्कालीन थाना प्रभारी का तबादला हुआ, लेकिन कालू यहीं रह गया.. इसके बाद जो भी प्रभारी आए, उन्होंने उसकी मासूमियत और चंचलता देखकर उसे अपनाया—और देखते ही देखते कालू थाने के परिवार का अभिन्न सदस्य बन गया..

मजेदार यह भी है कि नए थाना प्रभारी के आगमन पर कालू की मौजूदगी खुद-ब-खुद नोटिस में आ जाती है—मानो थाने में कदम रखने से पहले उसकी “अनौपचारिक अनुमति” जरूरी हो। जवान भी कालू को अपने बीच का साथी मानते हैं और उसकी हरकतों में उन्हें अपनापन और सुकून मिलता है..
चांदो थाना की यह अनोखी दोस्ती बताती है कि भरोसा, अपनापन और साथ सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। कभी-कभी एक बकरा भी पूरे पुलिस परिवार की पहचान बन जाता है—और बिना वेतन, बिना शिकायत, पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाता है।
