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कलेक्टोरेट के बगल में हरियाली का दम घुटा, पौधे सूखे, सिंचाई गायब और जिम्मेदार मौन !
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ कभी हरियाली, पर्यावरण संरक्षण और जनसुविधा का प्रतीक बनकर विकसित किया गया कृष्ण कुंज उद्यान आज प्रशासनिक उदासीनता और बदइंतजामी की मार झेल रहा है। कलेक्टोरेट परिसर के समीप स्थित यह हरित स्थल, जहां आम नागरिकों, अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रकृति की गोद में सुकून के कुछ पल बिताने का अवसर मिलना था, अब अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है।
जिस परिसर को लाखों रुपये खर्च कर विकसित किया गया था, वहां आज सूखे पौधे, वीरान जमीन और बिखरी व्यवस्थाएं प्रशासनिक दावों की पोल खोल रही हैं। हरियाली के नाम पर शुरू की गई यह महत्वाकांक्षी पहल अब उपेक्षा का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

पौधे सूखे, सिर्फ दिख रहे हैं खरपतवार , बंजर हुआ हरित क्षेत्र !
कभी छायादार और फलदार पौधों से सजे कृष्ण कुंज की वर्तमान तस्वीर चौंकाने वाली है। अधिकांश पौधे या तो सूख चुके हैं या मुरझाने की कगार पर हैं। परिसर में न तो हरियाली दिखाई देती है और न ही किसी प्रकार की नियमित देखभाल के संकेत। जगह-जगह सूखी मिट्टी और उजाड़पन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि इस योजना को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है।

सिंचाई व्यवस्था भी “लापता”, आखिर जिम्मेदार कौन?
स्थानीय लोगों का कहना है कि पौधों की सिंचाई के लिए यहां विशेष व्यवस्था और पंप लगाए गए थे, लेकिन अब वह पंप भी गायब बताया जा रहा है। सवाल यह है कि यदि सिंचाई के संसाधन ही नहीं बचेंगे तो पौधे जीवित कैसे रहेंगे? क्या प्रशासन ने कभी इसकी समीक्षा की? यदि पंप गायब है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों का जवाब देने वाला कोई नजर नहीं आ रहा।

लाखों की लागत पर पानी, जवाबदेही शून्य !
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकारी धन खर्च कर पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें जीवित रखना और योजना को सफल बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। कृष्ण कुंज की वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि योजना का उद्घाटन तो हुआ, लेकिन उसके बाद रखरखाव की जिम्मेदारी शायद फाइलों में ही दफन होकर रह गई।
यदि लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद पौधे सूख जाएं और पूरा परिसर बंजर हो जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी संसाधनों की बर्बादी का मामला भी माना जाना चाहिए।
क्या सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित थी हरित पहल ?
कृष्ण कुंज की दुर्दशा देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह परियोजना केवल पौधरोपण कार्यक्रमों और फोटो सेशन तक ही सीमित थी? यदि नहीं, तो फिर इसकी नियमित निगरानी क्यों नहीं हुई? आखिर किस अधिकारी ने आखिरी बार इस उद्यान का निरीक्षण किया था?

जनता की मांग—तत्काल हो जांच और पुनर्जीवन
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि कृष्ण कुंज की बदहाली की जांच कराई जाए। सूख चुके पौधों के स्थान पर नए पौधे लगाए जाएं, सिंचाई व्यवस्था को तत्काल बहाल किया जाए और उद्यान के नियमित रखरखाव के लिए जिम्मेदारी तय की जाए।
कटाक्ष….
कृष्ण कुंज कभी जिले की हरित सोच का प्रतीक था, लेकिन आज यह प्रशासनिक उपेक्षा का आईना बन गया है। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारी नहीं चेते, तो आने वाले दिनों में यह स्थल केवल एक असफल सरकारी योजना की कहानी बनकर रह जाएगा। हरियाली बचाने के बड़े-बड़े दावों के बीच कृष्ण कुंज की सूखी जमीन एक ही सवाल पूछ रही है—क्या पौधे लगाने के बाद उन्हें जीवित रखना जिम्मेदारी नहीं है?