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संजय गुप्ता/शंकरगढ़@ सरकारी योजनाओं की राशि किस तरह कागजों में दम तोड़ देती है, इसका एक और उदाहरण जनपद पंचायत शंकरगढ़ से सामने आया है.. यहां एक ऐसा मामला उजागर हुआ है, जिसमें अहाता निर्माण के लिए स्वीकृत राशि तो पंचायत के खाते में पहुंच गई, लेकिन निर्माण कार्य जमीन पर उतर ही नहीं पाया..
जनपद पंचायत शंकरगढ़ द्वारा जारी पत्र के अनुसार ग्राम पंचायत जोगीमा में शिक्षा अनुदान मद से 5 लाख रुपये की लागत से अहाता निर्माण की स्वीकृति दी गई थी.. काम शुरू कराने के लिए वर्ष 2021 में 2 लाख रुपये अग्रिम राशि भी जारी कर दी गई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पांच साल बीतने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ.. और राशि डकार ली गई..

पत्र में साफ उल्लेख है कि कई बार निर्देश देने के बावजूद न तो निर्माण कराया गया और न ही राशि वापस जमा की गई.. आखिरकार जनपद पंचायत को अब आरआरसी (राजस्व वसूली प्रमाण पत्र) की कार्रवाई का सहारा लेना पड़ रहा है, ताकि सरकारी धन की वसूली की जा सके..
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब काम शुरू ही नहीं हुआ तो दो लाख रुपये गए कहां ? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते इसकी निगरानी की ? यदि राशि का उपयोग नहीं हुआ तो इतने वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? और यदि राशि खर्च हो गई तो उसका हिसाब-किताब कहां है ?
यह मामला केवल दो लाख रुपये का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है.. जिस धन से गांव में विकास होना था, वह फाइलों में उलझकर रह गया.. अब देखना होगा कि आरआरसी की कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या फिर सरकारी धन की वास्तविक वसूली कर दोषियों की जिम्मेदारी भी तय की जाती है..
“अचूक प्रहार” का सवाल:
“सरकारी खजाने से निकले दो लाख रुपये आखिर पांच साल तक किसकी निगरानी में गायब रहे, और अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?”