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संजय गुप्ता/बलरामपुर@ (प्रधान संपादक के नजरिया से)
छत्तीसगढ़–झारखण्ड सीमा स्थित ओरसा घाट पर 18 जनवरी 2026 को हुई भीषण बस दुर्घटना ने एक बार फिर व्यवस्था की खोखली हकीकत उजागर कर दी.. स्कूल बस में सवार यात्रियों की मौत कोई “दुर्घटना” भर नहीं, बल्कि लापरवाही, अनदेखी और नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का नतीजा है..
सड़क दुर्घटना: प्रशासन की लापरवाही का खुला प्रमाण..
बलरामपुर जिले की सीमापति ग्राम पंचायत में हुई दिलदहला देने वाली सड़क दुर्घटना ने न केवल 10 निर्दोष जानें लीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की यातायात व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.. एक स्कूल बस में 80-90 लोग ठूंसकर झारखंड जा रहे थे, जहां एक सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होने का उद्देश्य था.. यह बस गणेश मोड चौकी, चांदो और सामरी थाना क्षेत्र से गुजरते हुए सीमा पार कर गई, लेकिन कहीं कोई जांच नहीं हुई.. परिणामस्वरूप, झारखंड में दुर्घटना में 10 मौतें और बड़ी संख्या में घायल ? यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता उदाहरण है.. जब पूरे जिले में सड़क सुरक्षा माह मनाया जा रहा है..
यातायात पुलिस जगह-जगह लोगों को समझाइश दे रही है, गुलाब बांट रही है और फोटो सेशन करवा रही है, तब 120 किलोमीटर के सफर में एक भी अधिकारी ने इस ओवरलोडेड बस को क्यों नहीं रोका ?

बलरामपुर पुलिस दावा करती है कि जिले में सुरक्षा इतनी मुस्तैद है कि एक पत्ता भी बाहर नहीं जा सकता, ऐसे में अवैध सामान की तस्करी असंभव कैसे है..?
फिर यह बस कैसे निर्बाध रूप से सीमा पार कर गई? क्या यातायात विभाग सो रहा था ? छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा क्षेत्रफल वाला जिला होने के कारण, जो तीन राज्यों की सीमाओं से लगा है, यहां यातायात पुलिस की जिम्मेदारी दोगुनी है.. तस्करी के खतरे को देखते हुए पेट्रोलिंग और चेकिंग सख्त होनी चाहिए, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है..
सबसे चिंताजनक बात यातायात प्रभारी की वैकल्पिक व्यवस्था है, जो तीन साल से चली आ रही है.. एक ही अधिकारी के पास कई बड़ी जिम्मेदारियां हैं, और पता नहीं किस संरक्षण में यह प्रभार चल रहा है.. ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम कैसे संभव ? यह ग्रामीण परिवार गांव वासी थे, जिन्हें वाहनों की क्षमता या नियमों की जानकारी नहीं थी.. यदि कोई जिम्मेदार व्यक्ति उन्हें रोकता, तो शायद यह दर्दनाक हादसा टल जाता.. घर के मुखिया और चिराग खोने वाले परिवारों का दर्द असहनीय है..

करीब 10 जिंदगियां खत्म हो गईं, कई घायल हैं और सवाल यह है—जिम्मेदार कौन ?
इस हृदयविदारक हादसे को सरगुजा रेंज पुलिस के पुलिस महानिरीक्षक ने गंभीरता से लेते हुए विशेष जांच समिति गठित की है.. साफ संदेश है—दोषी कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा.. वाहन स्वामी और चालक ही नहीं, यदि कहीं पुलिस या परिवहन तंत्र की शिथिलता पाई गई, तो उन पर भी कठोर कार्रवाई तय है..
जांच में उन सवालों को खोला जाएगा, जिन्हें अक्सर हादसों के बाद फाइलों में दफना दिया जाता है—क्या निजी स्कूल बस को अंतरराज्यीय सवारी ढोने की अनुमति थी ? फिटनेस और पंजीयन वैध थे या कागजों का खेल चल रहा था ? चालक के पास हेवी मोटर व्हीकल लाइसेंस था या नहीं ?

बस की सीटिंग क्षमता कितनी थी और ओवरलोडिंग किसके इशारे पर हुई?
इतना ही नहीं, यह भी जांच होगी कि संबंधित इलाके में पुलिस और परिवहन विभाग ने नियमित चेकिंग की या आंख मूंदे बैठे रहे.. यदि कर्तव्य में लापरवाही, उदासीनता या मिलीभगत सामने आई, तो जिम्मेदार अफसरों पर विभागीय और वैधानिक हथौड़ा चलेगा..
आईजी के निर्देश पर बलरामपुर जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विश्व दीपक त्रिपाठी के नेतृत्व में गठित टीम को निष्पक्ष, तथ्यपरक और समयबद्ध रिपोर्ट सौंपने के आदेश हैं.. मकसद साफ है—दोषियों की पहचान और भविष्य में ऐसी मौतों पर पूर्ण विराम..
यह हादसा चेतावनी है—जब नियम रौंदे जाते हैं, तो सड़कें कब्रगाह बन जाती हैं.. अब देखना यह है कि जांच कागजों में दम तोड़ती है या सचमुच न्याय की रफ्तार पकड़ती है..

मामले में IG नहीं लिया संज्ञान..
सरगुजा आईजी ने संज्ञान लेते हुए जांच दल गठित किया है, जिसमें बलरामपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विश्व दीपक त्रिपाठी नेतृत्व कर रहे है.. उन्होंने सख्त निर्देश दिए हैं कि पुलिस, परिवहन अधिकारी या किसी भी जिम्मेदार की लापरवाही पर कठोर कार्रवाई होगी.. यह कदम सराहनीय है, लेकिन सवाल है कि क्या जांच के बाद यातायात विभाग को स्थायी प्रभारी मिलेगा ? या फिर वैकल्पिक व्यवस्था जारी रहेगी? प्रशासन को चाहिए कि यातायात पुलिस की संख्या बढ़ाए, नियमित चेकिंग सुनिश्चित करे और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चला.. सीमावर्ती जिलों में इंटरस्टेट कोऑर्डिनेशन मजबूत हो, ताकि ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं.. अंत में, सड़क सुरक्षा सिर्फ कागजी नहीं, व्यावहारिक होनी चाहि.. प्रशासन जागे, अन्यथा और जानें जाएंग..!!
