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जल संसाधन विभाग संभाग-02 में ‘रटा-रटाया बहाना’ सुपरहिट; EE साहब, SDO और बाबू मिश्रा गायब रहे तो ‘फील्ड’ का कवच, छोटे स्टाफ पर हुई कार्यवाही, व्यवस्था जस की तस !
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ सरकारी दफ्तरों में मलाईदार कुर्सियों पर बैठे अफसरों और रसूखदार बाबुओं के लिए ‘फील्ड ड्यूटी’ एक ऐसा अचूक मंत्र बन गया है, जिसके नाम पर दफ्तर से चाहे जितने दिन गायब रहो, कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। जल संसाधन विभाग संभाग क्रमांक 02 में भी लंबे समय से यही वीआईपी खेल चल रहा था। हमारे न्यूज पोर्टल ने इस दफ्तर की महा-लापरवाही और जनता की परेशानी को पूरी बेबाकी से उजागर किया था। खबर का ऐसा करारा असर हुआ कि खुद कलेक्टर साहब ने मामले को गंभीरता से लिया और कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम की टीम सीधे विभाग में औचक निरीक्षण करने धमक पड़े।
कलेक्टर की इस अचानक हुई कार्रवाई से पूरे जल संसाधन विभाग में हड़कंप मच गया। टेबल-कुर्सियां खाली पड़ी थीं और साहब लोग नदारद थे। मौके पर एक-दो नहीं बल्कि पूरे 13 कर्मचारी दफ्तर से गायब मिले। एसडीएम ने बिना देर किए इन कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का चाबुक चला दिया। लेकिन, इस पूरी कार्रवाई का सबसे कड़वा सच यह है कि दफ्तर का जो असली गठजोड़ है, वह आज भी सीना ताने खड़ा है। कार्रवाई की बड़ी-बड़ी खबरों के बीच, जो इस अव्यवस्था के असली सूत्रधार हैं, वो साफ बच निकले।

जनता पूछ रही है- त्रिमूर्ति सच में फील्ड में थी या मजे काट रही थी ?
अब दफ्तर के भीतर से लेकर आम जनता के बीच एक ही चर्चा गर्म है कि आखिर असली जिम्मेदारों पर शिकंजा कब कसेगा? हमारी पिछली खबर के जो मुख्य किरदार थे— कार्यपालन अभियंता (EE) एन. पी. डहरिया, अनुविभागीय अधिकारी (SDO) और वरिष्ठ कार्यलिपिक रामभान मिश्रा — वो इस कलेक्टर रेड के दौरान भी अपनी कुर्सियों से नदारद थे। लेकिन जैसे ही कलेक्टर के निर्देश पर टीम दफ्तर पहुंची, इन बड़े साहबों की तरफ से वही पुराना, घिसा-पिटा और रटा-रटाया बहाना आगे कर दिया गया कि— “साहब लोग तो सरकारी काम से फील्ड विजिट पर निकले हैं।” ताज्जुब की बात यह है कि प्रशासन ने भी बिना किसी जांच-पड़ताल या क्रॉस-वेरिफिकेशन के इस रटे-रटाए बहाने को सच मान लिया और बड़े साहबों को क्लीन चिट दे दी।
छोटे कर्मचारियों की ‘बली’, बड़े साहबों को वीआईपी वीटो क्यों ?
इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि नियम-कायदे और समय पर दफ्तर आने का डंडा सिर्फ कंप्यूटर ऑपरेटर, भृत्य और छोटे बाबू जैसे निचले वर्ग के कर्मचारियों के लिए ही है। 13 छोटे कर्मचारियों पर डंडा चलाकर प्रशासन ने अपनी पीठ तो थपथपा ली, लेकिन जनता के इन तीखे सवालों का जवाब किसके पास है:
क्या कार्यपालन अभियंता एन. पी. डहरिया और SDO साहब के इस ‘फील्ड दौरे’ की कोई एंट्री मूवमेंट रजिस्टर में दर्ज थी?
वरिष्ठ कार्यलिपिक रामभान मिश्रा, जिनकी मनमानी और गायब रहने की शिकायतें आम हैं, वो अचानक कौन से वीआईपी सर्वे पर निकल गए थे ?
क्या प्रशासन इन बड़े अधिकारियों की सरकारी गाड़ियों की लॉग-बुक और उनके मोबाइल का टावर लोकेशन चेक करने की हिम्मत दिखाएगा, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके कि साहब लोग सच में धूप में फील्ड नाप रहे थे या घर पर एसी की हवा खा रहे थे?
ढर्रा वही, साहबों की मौज और जनता परेशान!
खबर का असर हुआ, कलेक्टर साहब ने मुस्तैदी दिखाई, यह काबिलेतारीफ है। लेकिन जब तक इस विभाग को चलाने वाले बड़े अफसर और रसूखदार बाबू खुद वक्त पर दफ्तर में बैठकर फाइलों का निपटारा नहीं करेंगे, तब तक सिर्फ छोटे कर्मचारियों की सैलरी काटने या नोटिस थमाने से दफ्तर का ढर्रा सुधरने वाला नहीं है। आज भी दूर-दराज से आए किसान और ठेकेदार अपनी फाइलों पर साहब के दस्तखत के लिए भटक रहे हैं और साहब ‘फील्ड’ का बोर्ड टांगकर गायब हैं।
अब आर-पार की लड़ाई: मोबाइल लोकेशन और लॉग बुक की जांच हो..
‘फील्ड ड्यूटी’ के नाम पर चल रहे इस गोरखधंधे का पूरी तरह खात्मा होना जरूरी है। आम जनता और प्रबुद्ध वर्ग की मांग है कि गायब रहने वाले इन तीनों (EE डहरिया, SDO और बाबू मिश्रा) के उस दिन के मोबाइल टावर लोकेशन की निष्पक्ष जांच की जाए। साथ ही इनके फील्ड पर जाने के लिखित आदेश को सार्वजनिक किया जाए।
जब तक इन बड़े चेहरों पर सीधी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह औचक निरीक्षण महज एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाएगा। हमारे न्यूज पोर्टल “अचूक प्रहार” की नजर इस पूरे मामले की हर एक फाइल पर है, जब तक असली गुनहगारों का चेहरा बेनकाब नहीं होता, हमारी कलम रुकेगी नहीं।