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संजय गुप्ता/रामानुजगंज@ सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों के समय पर आने और जनता की समस्याएं सुनने की बातें तो आपने खूब सुनी होंगी, लेकिन रामानुजगंज स्थित जल संसाधन विभाग शायद इन परंपराओं से बहुत आगे निकल चुका है। यहां के हेड ऑफ डिपार्टमेंट एन.पी. डहरिया साहब का कार्यालय से ऐसा मोहभंग हुआ है कि उन्हें ढूंढना किसी लापता व्यक्ति की तलाश से कम नहीं लगता।

कार्यालय पहुंचिए तो साहब के केबिन पर ताला आपका स्वागत करता है। कर्मचारियों से पूछिए तो जवाब भी रटा-रटाया मिलता है—”साहब नहीं हैं”, “दौरे पर गए हैं” या फिर “अभी आएंगे”। लेकिन यह “अभी” कब आएगा, इसका जवाब शायद विभाग के पास भी नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि साहब का अधिकतर समय अंबिकापुर में गुजरता है और रामानुजगंज कार्यालय महज उनके पदस्थापना आदेश में ही मौजूद है।
हालात इतने दिलचस्प हैं कि फोन पर संपर्क करना भी किसी सरकारी योजना की सफलता जैसा दुर्लभ अनुभव बन चुका है। घंटियां बजती रहती हैं, लेकिन जवाब नहीं मिलता। ऐसा लगता है जैसे विभागीय जिम्मेदारियां भी कॉलर ट्यून सुन-सुनकर वापस लौट जाती हों।

केवल विभाग प्रमुख ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ लेखपाल रामभान मिश्रा की कार्यशैली भी कम चर्चा में नहीं है। कागजों में उनकी पदस्थापना रामानुजगंज में है, लेकिन लोगों का दावा है कि उनके दर्शन भी अंबिकापुर में ही होते हैं। कार्यालय में उनकी कुर्सी मौजूद है, पर उस पर बैठने वाले महाशय शायद किसी और जिले में अपना प्रशासनिक चमत्कार दिखा रहे हैं।
कहावत है—”जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का।” यहां यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती नजर आती है। जब विभाग का मुखिया ही कार्यालय में शायद ही दिखाई दे, तो अधीनस्थ कर्मचारियों से नियमित उपस्थिति और जवाबदेही की उम्मीद करना भी किसी सपने से कम नहीं है। विभाग के कई कमरों पर लटके ताले मानो खुद गवाही दे रहे हों कि यहां काम से ज्यादा सन्नाटा मौजूद है।

बीते कई दिनों से अधिकारी से मिलने पहुंचे लोगों को सिर्फ बंद कमरे, खाली कुर्सियां और बहानों की फेहरिस्त ही हाथ लगी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कार्यालय जनता की सेवा के लिए संचालित हो रहा है या फिर अनुपस्थित अधिकारियों की सुविधा के लिए?
जिले की नवपदस्थ कलेक्टर महोदया से आमजन अपेक्षा कर रहे हैं कि वे इस पूरे मामले का संज्ञान लें और यह पता लगाएं कि आखिर सरकारी कार्यालय जनता के लिए चल रहे हैं या फिर सिर्फ उपस्थिति पंजिका और वेतन बिलों के लिए।

क्योंकि यदि हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले दिनों में जल संसाधन विभाग को लोग उसके काम से नहीं, बल्कि “ताला संसाधन विभाग” के नाम से पहचानने लगेंगे।