![]()
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ कुसमी विकासखंड के ग्राम झालबासा की बदहाली को लेकर “अचूक प्रहार” ने जो मुद्दा उठाया, उसने एक बार फिर प्रशासन की सुस्ती पर करारा तमाचा जड़ दिया है.. 78 साल की आज़ादी के बाद भी जहां लोग साफ पानी के लिए तरस रहे थे, वहां हमारी खबर ने सिस्टम को झकझोर कर रख दिया..
करीब 500 की आबादी वाले इस गांव में लोग आज भी नदी-नालों और कुओं का दूषित पानी पीने को मजबूर थे.. अचूक प्रहार की टीम जब ग्राउंड जीरो पर पहुंची और हकीकत उजागर की, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी.. आनन-फानन में जनपद सीईओ अभिषेक पांडे के निर्देश पर एक बोरवेल तो खनवा दिया गया — लेकिन सवाल ये है कि क्या इतने बड़े बस्ती के लिए सिर्फ एक बोरवेल ही काफी होगा ?

सच तो ये है कि ये सिर्फ “काम दिखाने” की कवायद ज्यादा लगती है, समाधान कम.. जहां कम से कम तीन बोरवेल की जरूरत है, वहां एक लगाकर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा रहा है.. हालात ये हैं कि पानी तो किसी तरह मिल गया, लेकिन बिजली आज भी सपना बनी हुई है..

यानी समस्या आधी सुलझी, आधी जस की तस !
अचूक प्रहार साफ तौर पर पूछता है.. क्या यही है विकास का मॉडल? क्या ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं के लिए हर बार मीडिया का सहारा लेना पड़ेगा?
जब तक झालबासा के लोगों को पूरी तरह से पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलती, तब तक ये लड़ाई जारी रहेगी… क्योंकि अचूक प्रहार सिर्फ खबर नहीं उठाता, उसे अंजाम तक पहुंचाता है!