उपचार को प्राथमिकता, कथन की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सुनिश्चित करने पर जोर!
डेस्क_बलरामपुर@ पुलिस अधीक्षक वैभव बैंकर ने कलेक्ट्रेट कक्ष से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यपालिक मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारियों एवं चिकित्सा अधिकारियों की बैठक लेकर मृत्युकालीन कथन दर्ज करने की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) की विस्तृत जानकारी दी। यह बैठक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर द्वारा रमेश चक्रधारी विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन प्रकरण में पारित आदेश तथा शासन के निर्देशों के पालन में आयोजित की गई।
बैठक में पुलिस अधीक्षक ने कहा कि गंभीर रूप से घायल या पीड़ित व्यक्ति के मामले में सबसे पहले उसके उपचार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही न्यायालय में कथन की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यथासंभव उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सुनिश्चित की जाए। उन्होंने बताया कि मृत्युकालीन कथन न्यायालय में महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। ऐसे में इसे निष्पक्ष और सही तरीके से दर्ज करना न्याय दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
एसओपी के प्रावधानों की जानकारी देते हुए बताया गया कि घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी या चिकित्सक क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट को तत्काल सूचित करेंगे। हालांकि, पीड़ित की हालत अत्यंत नाजुक होने पर चिकित्सक या पुलिस अधिकारी स्वयं भी कथन दर्ज कर सकते हैं। कथन दर्ज करने से पहले और बाद में ड्यूटी डॉक्टर से पीड़ित की मानसिक स्थिति का लिखित प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होगा।
पीड़ित पर किसी प्रकार का दबाव या प्रभाव न पड़े, इसके लिए कथन दर्ज करते समय रिश्तेदारों, परिचितों और पुलिसकर्मियों को कक्ष से बाहर रखा जाएगा। कथन को प्रश्न-उत्तर के रूप में पीड़ित की अपनी भाषा-बोली और सटीक शब्दों में दर्ज किया जाएगा। यदि पीड़ित बोलने में असमर्थ है, तो उसके इशारों के माध्यम से दिए गए कथन को भी दर्ज किया जाएगा।
कथन पूरा होने के बाद उसे पीड़ित को पढ़कर सुनाया जाएगा तथा उसके हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लिया जाएगा। इसके साथ ही कथन दर्ज करने वाले अधिकारी और चिकित्सक तिथि एवं समय सहित अपने हस्ताक्षर करेंगे।
पुलिस अधीक्षक वैभव बैंकर ने सभी संबंधित अधिकारियों को एसओपी का अक्षरशः पालन करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने से पीड़ित को समय पर उपचार उपलब्ध कराने के साथ न्याय सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी।