
केमिकल युक्त पानी बांकी नदी में छोड़े जाने का ग्रामीणों का आरोप, 10 से ज्यादा मवेशियों की मौत का दावा; एसडीएम से लगाई कार्रवाई की गुहार !
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ ग्राम पंचायत महावीरगंज में स्थित ग्रेफाइट केमिकल प्लांट को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्लांट से निकलने वाला कथित रूप से दूषित और बिना पर्याप्त उपचार किया गया पानी सीधे बांकी नदी में छोड़ा जा रहा है। यही नदी आसपास के दर्जनों गांवों के लिए खेती, पशुपालन और घरेलू जरूरतों का महत्वपूर्ण जलस्रोत है। ऐसे में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि नदी में छोड़ा जा रहा रासायनिक अपशिष्ट अब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि इंसानों और बेजुबान पशुओं के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।

नदी का पानी… और खेतों में बर्बादी का डर
ग्रामीणों के अनुसार बांकी नदी के पानी का इस्तेमाल वे धान की खेती और सिंचाई के लिए करते हैं। उनका आरोप है कि प्लांट से निकलने वाले दूषित पानी के नदी में मिलने के बाद फसलों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है और खेती बर्बाद होने की स्थिति बन रही है।
सबसे गंभीर आरोप पशुओं को लेकर सामने आया है। ग्रामीणों का दावा है कि नदी का पानी पीने के बाद मवेशी बीमार पड़ रहे हैं और अब तक 10 से अधिक पशुओं की मौत हो चुकी है। हालांकि इन मौतों का वास्तविक कारण क्या है, इसकी पुष्टि संबंधित विभाग की वैज्ञानिक जांच के बाद ही हो सकेगी।

नहाने से लेकर नदी पार करने तक… ग्रामीणों की परेशानी
ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से नदी के पानी का इस्तेमाल नहाने और घरेलू कामकाज के लिए करते आ रहे हैं। आरोप है कि पानी के संपर्क में आने के बाद लोगों को खाज-खुजली और त्वचा संबंधी परेशानियां हो रही हैं। कुछ ग्रामीणों ने नदी पार करने के दौरान शरीर पर छाले पड़ने की शिकायत भी की है।
यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं तो मामला केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, पशुधन और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

10 साल पुराना प्लांट, चार महीने पहले दोबारा शुरू होने का दावा
ग्रामीणों के मुताबिक प्लांट करीब 10 वर्ष पहले स्थापित हुआ था, लेकिन लंबे समय से बंद पड़ा था। उनका कहना है कि लगभग चार महीने पहले इसे दोबारा शुरू किया गया है। प्लांट के संचालन के बाद से ही नदी के पानी को लेकर ग्रामीणों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि औद्योगिक अपशिष्ट के निपटारे के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं, जैसे अपशिष्ट जल के उपचार की प्रणाली और निर्धारित भंडारण व्यवस्था, प्रभावी तरीके से संचालित नहीं की जा रही हैं और कथित तौर पर दूषित पानी नदी में पहुंच रहा है।

शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ग्रामीणों की शिकायतें लंबे समय से प्रशासन तक पहुंच रही थीं, तो अब तक इसकी वैज्ञानिक जांच क्यों नहीं हुई?
ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने इस मामले को लेकर कई बार संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब ग्रामीणों ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

अब प्रशासन की परीक्षा… नदी में सचमुच बह रहा है जहर या आरोपों में कितना दम?
मामले में अब सबसे जरूरी है कि प्रशासन केवल शिकायत को कागजों तक सीमित न रखे, बल्कि बांकी नदी के पानी, प्लांट से निकलने वाले अपशिष्ट और प्रभावित क्षेत्रों की मिट्टी के वैज्ञानिक नमूने लेकर जांच कराए। साथ ही पशुओं की मौत और ग्रामीणों में सामने आ रही कथित त्वचा संबंधी समस्याओं की भी चिकित्सकीय जांच कराई जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक नदी का नहीं है…
सवाल उन खेतों का है, जिनमें ग्रामीण अपनी जिंदगी बो रहे हैं। सवाल उन मवेशियों का है, जो बोल नहीं सकते। सवाल उन परिवारों का है, जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें इसी नदी से पूरी होती हैं। और सबसे बड़ा सवाल—अगर नदी में वाकई जहरीला अपशिष्ट पहुंच रहा है, तो आखिर जिम्मेदार कौन है?
अब निगाहें जिला प्रशासन और एसडीएम की जांच पर टिकी हैं।
देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच कराकर दोषी पाए जाने वालों पर क्या कार्रवाई करता है और बांकी नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या कदम उठाता है।



