![]()
संजय गुप्ता/बलरामपुर@ किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से बनाई जा रही भाला-गिरवानी सिंचाई परियोजना पहली ही बारिश की मार नहीं झेल सकी। करीब 4.88 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन कंक्रीट नहर पहली तेज बारिश में कई जगहों से दरक गई। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अब जिस मरम्मत के भरोसे नहर को फिर खड़ा किया जा रहा है, उसी मरम्मत में भी तकनीकी मानकों को ताक पर रखने के दोबारा उसी घटिया स्तर से कम को किया जा रहा हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जहां कंक्रीट को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए वाइब्रेटर मशीन का उपयोग अनिवार्य माना जाता है, वहां मजदूर डंडों से कंक्रीट दबाकर मरम्मत कर रहे हैं। गीली मिट्टी में ही डंडे और लकड़ी का उपयोग सवाल उठ रहा है कि अगर सुधार कार्य भी इसी लापरवाही से होगा, तो करोड़ों की यह परियोजना आखिर कितने दिन टिक पाएगी?

करीब 5.50 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत घाघा नदी से 5.5 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण किया जा रहा है, जिससे भाला, विजयनगर सहित आसपास के गांवों की लगभग 200 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलनी है। लेकिन निर्माण पूरा होने से पहले ही नहर का टूट जाना पूरे निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
स्थानीय किसान सरवन सोनी, इफ्तेखार खान, विनीत गुप्ता और रामकुमार धुर्वे का कहना है कि उन्होंने निर्माण के दौरान ही विभाग को घटिया गुणवत्ता की शिकायत की थी। किसानों का आरोप है कि निर्माण में मानक के अनुरूप सामग्री का उपयोग नहीं किया गया, कंक्रीट की सही तरीके से क्योरिंग नहीं हुई और विभागीय अधिकारियों ने निगरानी की जिम्मेदारी गंभीरता से नहीं निभाई। नतीजा सामने है—पहली ही बारिश में करोड़ों की नहर जवाब दे गई।
अब मरम्मत कार्य को लेकर भी ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि तकनीकी नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है और मरम्मत भी केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। यदि अभी भी गुणवत्ता से समझौता किया गया तो भविष्य में नहर दोबारा क्षतिग्रस्त होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामले पर जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने कहा कि उन्हें शिकायत की जानकारी मिली है। निरीक्षण के लिए एसडीओ को मौके पर भेजा जा रहा है। रिपोर्ट मिलने के बाद जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
अब ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच की मांग करते हुए दोषी अधिकारियों और संबंधित ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई है। उनका कहना है कि किसानों के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन यदि निर्माण और मरम्मत दोनों में ही लापरवाही होगी, तो यह सरकारी धन के साथ किसानों के भविष्य से भी खिलवाड़ होगा।