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संजय गुप्ता@ पर्यावरण दिवस आते ही नेताओं और अधिकारियों के हाथों में पौधे दिखाई देने लगते हैं, कैमरों के फ्लैश चमकने लगते हैं और सोशल मीडिया पर हरियाली बचाने के संदेशों की बाढ़ आ जाती है.. ऐसा लगता है मानो धरती को बचाने का पूरा ठेका इन्हीं के कंधों पर हो.. लेकिन विडंबना देखिए कि जिन हाथों से एक पौधा रोपने का फोटो खिंचवाया जाता है, उन्हीं व्यवस्थाओं के दस्तावेजों में लाखों पेड़ों की बलि पर सहमति भी दर्ज होती है..
हसदेव अरण्य आज इसी दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है!
जिस जंगल को प्रकृति ने सदियों में गढ़ा, जिसे आदिवासियों ने अपनी संस्कृति और जीवन का हिस्सा बनाया, जिसे पर्यावरणविद देश की “हरित धरोहर” कहते हैं, उसी हसदेव के 1742 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र को विकास के नाम पर उजाड़ने की तैयारी है.. वनों की रक्षा का दायित्व निभाने वाले विभाग के जिम्मेदार अधिकारी ही जब वन भूमि डायवर्ट करने की अनुशंसा करें, तब सवाल केवल नीति का नहीं, नीयत का भी खड़ा होता है..
क्या विकास का मतलब नदियों के स्रोतों को सुखा देना है? क्या विकास का मतलब आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की सांसें गिरवी रख देना है ?
कहा जा रहा है कि यह विकास के लिए जरूरी है.. लेकिन सवाल यह है कि विकास आखिर किसका और किस कीमत पर ? क्या विकास का मतलब लाखों पेड़ों को काट देना है ?
लगभग 12 लाख वृक्ष हसदेव से विदा लेने वाले हैं.. यह केवल पेड़ों की संख्या नहीं है, यह करोड़ों पक्षियों के घोंसलों का विस्थापन है, हजारों वन्य जीवों के घरों का विनाश है, असंख्य जल स्रोतों की मृत्यु है और सबसे बढ़कर मानव जीवन के भविष्य पर लगा प्रश्नचिह्न है.. विडंबना यह भी है कि एक ओर शासन करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्षारोपण अभियान चलाता है, दूसरी ओर एक ही आदेश में लाखों पेड़ों को काटने की मंजूरी दे देता है.. जैसे कोई व्यक्ति सुबह रक्तदान शिविर लगाए और शाम को अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दे.. कागजों में लिखा जाएगा कि कटे हुए पेड़ों की भरपाई के लिए नए पौधे लगाए जाएंगे.. लेकिन कोई यह नहीं बताता कि सौ-दो सौ वर्ष पुराने जंगल की बराबरी कोई नर्सरी के पौधे कब और कैसे करेंगे.. जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होता, वह एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र होता है, जिसे तैयार होने में सदियां लगती हैं..
आज हसदेव के पेड़ कटेंगे, कल नदियां पानी मांगेंगी, परसों खेत नमी मांगेंगे और फिर मनुष्य जीवन स्वयं सांसें मांगता नजर आएगा.. तब शायद हम फिर किसी पर्यावरण दिवस पर एक पौधा लगाकर अपने अपराधबोध को धोने की कोशिश करेंगे.. हसदेव का सवाल केवल एक जंगल का नहीं है.. यह उस सोच का सवाल है जो विकास और विनाश के बीच का अंतर भूल चुकी है.. क्योंकि जिस विकास की नींव जंगलों की लाशों पर रखी जाए, वह अंततः सभ्यता का विकास नहीं, उसके भविष्य का विनाश होता है..
और इतिहास गवाह है—प्रकृति हर अन्याय का हिसाब रखती है.. उसकी अदालत में अपील नहीं होती, केवल परिणाम आते हैं.. आज हसदेव कटेगा, कल शायद हमारी सांसें..
मेरी चिल्लाहट बस यही तक !! संजय