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डेस्क_अचूक प्रहार/ हरकीरत के चश्मे से@ सीतापुर की राजनीति इन दिनों किसी विधानसभा क्षेत्र से ज़्यादा साउथ की डबिंग वाली एक्शन फिल्म लगने लगी है। फर्क बस इतना है कि यहां कैमरा नहीं चल रहा, लेकिन डायलॉग पूरे फिल्मी हैं — “कानून भी मेरा… पुलिस भी मेरी… फैसला भी मेरा!”
हाल ही में नायब तहसीलदार के साथ हुए घटनाक्रम और उसके बाद मची राजनीतिक चीख-पुकार ने एक बात तो साफ कर दी — जनता भले सड़क, पानी और रोजगार के लिए तरसती रहे, लेकिन नेताओं की “हीरोपंती” पूरे फॉर्म में चल रही है।
विधायक जी जिस अंदाज़ में मैदान में उतरे, उसे देखकर ऐसा लगा मानो प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि किसी गैंग का इलाका संभाला जा रहा हो। लोकतंत्र में चुना हुआ जनप्रतिनिधि जनता की आवाज़ होता है, लेकिन यहां तो मामला सीधे “मैं ही कानून हूं” वाली मानसिकता तक पहुंच गया।
अगर किसी अधिकारी से गलती हुई थी तो उसके लिए कानून था, जांच थी, शासन था, अदालत थी। लेकिन नहीं साहब! यहां तो फैसला भी मौके पर होगा, सुनवाई भी मौके पर होगी और सज़ा भी मौके पर ही तय कर दी जाएगी। मानो संविधान छुट्टी पर चला गया हो और लोकतंत्र को अस्थायी रूप से “दबंगतंत्र” में बदल दिया गया हो।
सबसे मज़ेदार बात यह है कि घटना के बाद जो माहौल बना, उसमें जनता की समस्या गायब हो गई और राजनीतिक नौटंकी का लाइव शो शुरू हो गया। कोई खुद को जनता का मसीहा बता रहा है, कोई लोकतंत्र का रक्षक, और सोशल मीडिया पर समर्थकों ने तो विधायक जी को लगभग “सिस्टम सुधारक सुपरहीरो” घोषित कर दिया।
अब सवाल यह है कि यदि हर विधायक खुद ही जांच अधिकारी, न्यायाधीश और दंडाधिकारी बन जाएगा, तो फिर थाने, कोर्ट और संविधान को ताला लगा देना चाहिए। सरकारी दफ्तरों में बोर्ड भी बदल देना चाहिए —
“यहां कानून नहीं, नेता जी का मूड चलता है।”